गज़ल 1222 ×4 सजावट जो हो तुम बिन घर ये पूरा सा नही लगता जो तुम इस घर मे रहती घर अधूरा सा नही लगता करूँ कैसे ये हाले दिल बयां तुम दूर मत जाओ बिना तेरे तो इक पल भी गवारा सा नही लगता ये चाँअद पूर्णिमा का हैं मगर तुम तो नही हो ना दुखा हो दिल हमारा तो अँजोरा सा नही लगता मिरा जो साथ छोड़ी ठीक था जो गैर की हो अब दिया है दर्द मुझको जो करारा सा नही लगता मुझे तुम बेवफ़ाई की सजा दी याद है हँसना तुम्हारे पास आने का इशारा सा नही लगता रक़ीबों से रफ़ीको की तरह तुम उल्फ़तें क्यों की तुम्हे कल की तरह 'अंशू' अवारा सा नही लगता -अम्बिका प्रसाद पाण्डेय "अंशू" रक़ीब-दुश्मन रफ़ीक-दोस्त,गवारा-स्वीकार,उल्फत-संग, अँजोरा-प्रकाश